गुरुवार 15 अक्टूबर 2026 - 19:20
इंक़ेलाब

इंक़ेलाब

लेखक : मिन्हाल आज़मी लखनऊ

हौज़ा /निकले हैं संविधान बचाने के वास्ते होगा हिमालिया से अब एलाने इंक़लाब

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी :

फिर उठ खड़े हुए हैं जवानाने-इंक़लाब
पल भर भी अब रुकेगा न तूफ़ाने-इंक़लाब

जब तक रगों में आख़िरी क़तरा है ख़ून का
हम सींचते रहेंगे गुलिस्ताने-इंक़लाब

हाथों में लेके अपने तिरंगा, बढ़े चलो
होगी न कम जहाँ में कभी शाने-इंक़लाब

अब तख़्ते-इक़्तिदार से तुम को उतार कर
पूरा यूँही करेंगे हम अरमाने-इंक़लाब

ज़ख़्मों की अपने शम्अ जलाएँगे कू-ब-कू
क्या ख़ूब जगमगाएगा ऐवाने-इंक़लाब

जोशो-ख़रोश, सब्रो-वफ़ा, कोहसारे-अज़्म
हम साथ अपने लाए हैं सामाने-इंक़लाब

दिल में शहादतों की उमंगें हैं बेक़रार
सीना-सिपर हैं हम सरे-मैदाने-इंक़लाब

निकले हैं संविधान बचाने के वास्ते
होगा हिमालिया से अब एलाने इंक़लाब

दुश्मन को हमने ख़ून के आँसू रुलाए हैं
तारीख़ ने ये देखा है दौराने इंक़लाब

अब राहे एहतेजाज पे मिन्हाल चल पड़ो
तुम को भी हो ही जाएगा इरफ़ाने-इंक़लाब

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